नर्मदा पुत्री शिप्रा का एक रोचक संस्मरण, उन्हीं की जुबानी में

उज्जैन.घर से दूर जीवन की पहली होली। अकारण अस्तित्व में कुछ भी नहीं घटता है। ये भी अनायास नहीं हुआ होगा।भाव की तीव्रता समझ को सूक्ष्म कर देती है। जब भाव का बहाव कम हुआ तब समझ आया कि इस बार की होली तो शिप्रा के घाट पर महाकाल संग होनी थी। इस बार का गुलाल तो शिप्रा के जल से मिलकर रचनाकार को लगाना था। इस बार होली दहन भस्म आरती के साथ होना था। ऐसी होली जब एक महामारी के कारण उज्जैन में दूर तक एक सन्नाटा पसरा हुआ है। न उज्जैन में कोई आ सकता न बाहर जा सकता। जैसे सृष्टिकर्ता ने विशेष मुझसे मिलने के लिए बिना बाधा के एक प्रयोजन रखा हो। उज्जैन की वायु में एकांतता दूर तक सिमटी हुई है। सब अपने घरों में क़ैद बैठे हंै। बस महाकाल के गण निकले हैं पताका, ढोल, गुलाल लेकर शिप्रा संग होली मनाने। जैसे इस वर्ष सिफऱ् शिप्रा के साथ ही अवंतिका को रंग में भीगना था। जैसे पूरी फुर्सत निकाल कर महाकाल अपनी शिप्रा को रंगने बैठे हों। गुलाल डाल के रंग से सराबोर जल महाकाल ने मुझसे होली के तीन दिन पहले ही स्वीकार कर लिया। फिर आदेश दिया राम घाट पर मोक्षदायिनी की आरती उतारने का।अब तक जिसे अकारण समझ रही थी वो सब कितना असाधारण था। महाकाल भी अपनी प्रचण्डता पर है और मेरी भक्ति भी अपनी सघनता पर…ऐसे कुछ क्षण होते होंगे जब भक्त को भगवत् कृपा प्राप्त हो जाती है।

नर्मदे हर
शिप्रे हर
जीवन भर

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