पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अनुमान या संदेह के आधार पर अधिकारियों पर टिप्पणी नहीं

चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक अधिकारियों पर ऐसे प्रतिकूल निष्कर्ष, जिनसे उनके सेवा जीवन या पेशेवर प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता हो, केवल अनुमान या संदेह के आधार पर दर्ज नहीं किए जा सकते।

अदालत ने कहा कि ऐसा तभी संभव है, जब रिकार्ड पर उपलब्ध सामग्री से उनके जानबूझकर किए गए कदाचार या कर्तव्य में जानबूझकर चूक का स्पष्ट प्रमाण हो।जस्टिस नीरजा के कलसन ने 2016 के दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए आरोपित की अपील स्वीकार करते हुए उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। साथ ही जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों की तीन याचिकाएं भी मंजूर करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और उनसे जुड़े निर्देशों को निरस्त कर दिया।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक अदालतों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जहां प्रत्येक पीड़ित सहानुभूति का हकदार है, वहीं प्रत्येक आरोपित भी संवैधानिक सुरक्षा का समान रूप से अधिकारी है। अदालत ने अपने आदेश में कहा, दोषसिद्धि ऐसी सामग्री पर आधारित नहीं हो सकती, जिसमें गंभीर असंगतियां हों। इसी प्रकार सार्वजनिक अधिकारियों के विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष केवल अनुमान या संदेह के आधार पर कायम नहीं रखे जा सकते। कानून का शासन महज संभावना या अटकल से कहीं अधिक उच्च स्तर के प्रमाण की मांग करता है।मामले की शुरुआत 23-24 सितंबर 2016 की रात दर्ज एफआईआर से हुई थी, जिसमें महिला ने अपहरण और दुष्कर्म के आरोप लगाए थे। रोहतक की अतिरिक्त सत्र अदालत ने सितंबर 2018 में आरोपित को भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

पुलिस अधिकारियों का चालान पेश होने से पहले ही तबादला
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी की सेवा, प्रतिष्ठा और भविष्य के कैरियर को प्रभावित करने वाली प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज करने से पहले उसे पर्याप्त सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर त्रुटिपूर्ण या अपूर्ण जांच अपने आप में जांच अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी का आधार नहीं बन सकती। हाई कोर्ट ने पाया कि संबंधित पुलिस अधिकारियों का चालान पेश होने से पहले ही तबादला हो चुका था और ट्रायल कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे जांच में कथित कमियों के लिए उनकी प्रत्यक्ष भूमिका सिद्ध होती। इतना ही नहीं, उन्हें अपना पक्ष रखने का सार्थक अवसर भी नहीं दिया गया।

अदालत ने यह भी नोट किया कि ट्रायल कोर्ट के निर्देशों के बाद दर्ज अलग एफआईआर की स्वतंत्र जांच में कथित मिलीभगत, जांच में हेरफेर और जानबूझकर कदाचार के आरोप पुष्ट नहीं हुए। जांच एजेंसी ने पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर रद्दीकरण रिपोर्ट सक्षम अदालत में प्रस्तुत कर दी, जो विचाराधीन है। इन सभी तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों तथा उनसे जुड़े सभी निर्देशों को भी निरस्त कर दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *