बागेश्वर में शंभू नदी पर बनी 1 किमी लंबी झील बनी खतरा, टूटी तो मच सकती है भारी तबाही

बागेश्वर/कपकोट
 उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी पहाड़ों में एक बार फिर किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की आहट सुनाई दे रही है. बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील अंतर्गत कुवारी इलाके में शंभू नदी का बहाव रुकने से बनी प्राकृतिक झील अब विकराल रूप ले चुकी है. झील में पानी का स्तर इतना बढ़ गया है कि स्थानीय नदी किनारे स्थित पारंपरिक श्मशान घाट पूरी तरह पानी में डूब गया है. आलम यह है कि ग्रामीणों के पास अब किसी परिजन की मृत्यु होने पर शव के अंतिम संस्कार तक की सुरक्षित जगह नहीं बची है। 

करीब 13 सालों से लगातार आकार बढ़ा रही इस झील का फैलाव अब एक किलोमीटर से भी ज्यादा हो चुका है. ग्रामीण दहशत के साए में जी रहे हैं, वहीं देश की शीर्ष अंतरिक्ष व सुदूर संवेदन एजेंसी नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC), हैदराबाद के वैज्ञानिकों की एक ताजा रिसर्च ने शासन-प्रशासन के कान खड़े कर दिए हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस झील में करीब 37 लाख घनमीटर (3.7 Million Cubic Metre) पानी का विशाल भंडार जमा है, जो किसी भी वक्त बड़े खतरे की वजह बन सकता है। 

श्मशान डूबा, चिता सजाने तक की जगह नहीं बची
पहाड़ों में जीवन हमेशा से चुनौतियों से भरा रहा है, लेकिन कुवारी और आसपास के गांवों के लिए अब अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी जरूरत भी नामुमकिन हो चली है. स्थानीय निवासी किशन दानू बताते हैं कि शंभू नदी में बीते कई सालों से थोड़ा-बहुत पानी रुककर झील बन रही थी, लेकिन इस बार हालात बेकाबू हो चुके हैं. पानी का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर है. किशन दानू के शब्दों में, ‘झील का दायरा एक किलोमीटर से ज्यादा फैल गया है. हमारा बरसों पुराना श्मशान घाट पूरी तरह जलमग्न हो चुका है. अब अगर गांव में किसी की मौत हो जाए, तो चिता लगाने तक की सूखी जमीन नहीं बच रही. यदि बारिश तेज हुई तो यह पानी गांवों और रास्तों को भी निगल जाएगा. प्रशासन को सिर्फ दौरे करने के बजाय इस समस्या का कोई पक्का और स्थायी हल निकालना चाहिए। 

प्रशासनिक टीम ने लिया जायजा, रिपोर्ट शासन को भेजी
झील का जलस्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ने और ग्रामीणों के आक्रोश के बाद गुरुवार को जिला प्रशासन हरकत में आया. आनन-फानन में सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग और भूवैज्ञानिकों की एक संयुक्त तकनीकी टीम मौके पर भेजी गई. टीम ने कुवारी और शंभू नदी के मुहाने पर पहुंचकर स्थिति का मुआयना किया और अपनी प्राथमिक रिपोर्ट आला अधिकारियों को सौंप दी. मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर जिलाधिकारी (एडीएम) एनएस नबियाल ने बताया कि टीम के निरीक्षण के अनुसार फिलहाल झील से पानी का निकास प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे हो रहा है, जिससे तत्काल कोई रुकावट जैसी आपात स्थिति नहीं है. हालांकि, खतरे की गंभीरता को देखते हुए पूरी रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है और विशेषज्ञ संस्थाओं से इसका एक विस्तृत भूगर्भीय और हाइड्रोलॉजिकल सर्वेक्षण कराने की सिफारिश की गई है। 

2013 की केदारनाथ आपदा के समय शुरू हुआ था सिलसिला
कुवारी की तलहटी में स्थित शंभू ग्लेशियर से निकलने वाली शंभू नदी पर यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई है. इसकी जड़ें जून 2013 की उस ऐतिहासिक आपदा से जुड़ी हैं, जिसने पूरे उत्तराखंड को हिलाकर रख दिया था. उस दौरान कुवारी पहाड़ी का एक विशाल हिस्सा टूटकर शंभू नदी की घाटी में समा गया था. भारी मलबे, बोल्डरों और गाद ने नदी के प्राकृतिक बहाव को रोक दिया. इसके बाद से ही वहां बार-बार पानी जमा होकर प्राकृतिक डैम बनने लगा. साल 2023 में भी जब जलस्तर खतरनाक स्तर पर पहुंचा था, तब सिंचाई विभाग कपकोट की टीम ने मौके पर जाकर मैन्युअल (हाथों से खुदाई) तरीके से पानी की निकासी कराई थी और खतरे को टाला था. लेकिन पहाड़ से लगातार मलबा गिरने के कारण नदी का गला बार-बार घुट जाता है और झील फिर से आकार ले लेती है। 

NRSC हैदराबाद की सैटेलाइट रिसर्च: 400 मीटर से 1130 मीटर तक कैसे फैली झील?
हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2013 से लेकर 2025 तक के सैटेलाइट डेटा, 2014 से 2024 तक के InSAR डेटा और जमीनी स्तर पर की गई फील्ड जांच का बारीकी से अध्ययन किया है. इस वैज्ञानिक अध्ययन से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं:

    नवंबर 2013: पहली सैटेलाइट तस्वीरों में झील की लंबाई महज 400 मीटर और चौड़ाई 20 मीटर दर्ज की गई थी.
    साल 2014: लंबाई बढ़कर लगभग 580 मीटर हो गई.
    साल 2021: झील की लंबाई 680 मीटर तक पहुंच गई.
    अप्रैल 2022: झील का फैलाव बढ़कर 885 मीटर हुआ.
    अक्टूबर 2022: झील की लंबाई करीब 900 मीटर और चौड़ाई 80 मीटर मापी गई.
    अक्टूबर 2023: लंबाई 1050 मीटर और चौड़ाई 85 मीटर पार कर गई.
    अक्टूबर 2024 (ताजा स्थिति): झील की लंबाई रिकॉर्ड 1130 मीटर (1.13 किमी) और चौड़ाई 100 मीटर तक दर्ज की गई.

वैज्ञानिकों के गणना मॉडल के अनुसार, वर्तमान में इस मलबे के बांध के पीछे लगभग 37 लाख घनमीटर पानी जमा हो चुका है, जो निचले इलाकों के लिए किसी टाइम बम जैसा है। 

नीचे से नहीं, ऊपर की ओर खिसक रहा है पहाड़
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कुवारी लैंडस्लाइड की प्रकृति को लेकर एक बेहद संवेदनशील खुलासा किया है. वैज्ञानिकों ने इसे ‘रेट्रोग्रेसिव लैंडस्लाइड’ की श्रेणी में रखा है. आसान शब्दों में कहें तो, आमतौर पर पहाड़ नीचे की तरफ गिरते हैं, लेकिन यहां भूस्खलन का ऊपरी सिरा धीरे-धीरे पहाड़ के पीछे और ऊपर की तरफ खिसक रहा है. पहाड़ में नई-नई दरारें आ रही हैं, जमीन से पानी का रिसाव हो रहा है और वहां की चट्टानें बेहद कमजोर व भुरभुरी हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि खतरा सिर्फ नदी में पहले से पड़े मलबे से नहीं है, बल्कि जिस ढलान से मलबा आ रहा है, वह ढलान खुद पूरी तरह अस्थिर है और कभी भी पहाड़ का एक और बड़ा हिस्सा नीचे गिर सकता है। 

मानसून और बारिश बढ़ा देती है पहाड़ की कंपकंपी
InSAR सैटेलाइट तकनीक के जरिए वैज्ञानिकों ने पाया कि बारिश और जमीन की हलचल के बीच सीधा संबंध है. जब-जब इलाके में तेज बारिश होती है, तब-तब पहाड़ी ढलानों का विस्थापन और उनकी गति तेज हो जाती है. कुवारी क्षेत्र की कमजोर भू-संरचना के बीच जब पानी रिसता है, तो वह चट्टानों के जोड़ को ढीला कर देता है. यही वजह है कि मानसून के दिनों में कुवारी पहाड़ी से भारी चट्टानों का नदी में गिरना बढ़ जाता है, जिससे झील का मुहाना और ज्यादा बंद हो जाता है। 

अगर झील टूटी तो 15 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से मचेगी तबाही
इस समूची वैज्ञानिक रिपोर्ट का सबसे डरावना और अहम पहलू है LLOF यानी ‘लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फ्लड’. ग्लेशियर या भूस्खलन से बनी अस्थिर प्राकृतिक झीलें जब अचानक टूटती हैं, तो निचले इलाकों में सैलाब आ जाता है (जैसा चमोली के ऋषिगंगा या सिक्किम की ल्होनक झील में देखा गया था). वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन मॉडलिंग के जरिए यह समझने की कोशिश की कि यदि 37 लाख घनमीटर पानी को रोककर बैठा यह कच्चा मलबे का बांध अचानक टूट जाए, तो क्या होगा?

    पानी का वेग: मॉडलिंग के मुताबिक, बांध टूटने की जगह पर पानी की अधिकतम रफ्तार करीब 15 मीटर प्रति सेकंड (लगभग 54 किमी प्रति घंटा) तक हो सकती है। 
    जलस्तर में उछाल: डाउनस्ट्रीम (निचले प्रवाह वाले क्षेत्रों) में नदी का जलस्तर अपने सामान्य स्तर से 10 मीटर (लगभग 32 फीट से ज्यादा) ऊपर तक उठ सकता है। 

हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक ‘एक्सट्रीम ब्रीच सिनेरियो’ (अत्यधिक विषम परिस्थिति) पर आधारित कंप्यूटर मॉडल है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं. बांध कितनी चौड़ाई में टूटेगा, मिट्टी कटने की दर क्या होगी और पानी किस रफ्तार से बाहर निकलेगा, इसमें कई अनिश्चितताएं हैं। 

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